बुधवार, 6 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
प्रकृति परम् ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञान है । प्रकृति समस्त क्रियाओं की जननी होती है । प्रकृति समस्त क्रियाओं की नियंत्रक होती है । यह क्रियाँओं का सम्पादन व नियंत्रण जिस अद्भुद विज्ञानिक पद्धति से समपन्न करती है उसे मनुष्य प्रयत्न करके भी नहीं जान पाता है । प्रकृति के उपरोक्त व्यक्त क्रिया सम्पादन व क्रियाओं के नियंत्रण की व्यख्या न कर पाने की इसी विवशता को माया शब्द से ब्यक्त किया जाता है । माया शब्द का प्रयोग धर्म दर्शन में प्रचुर परिमाप में किया गया है ।
जैसा कि मनुष्य शरीर के रचना के संदर्भ में अंकित किया गया था, प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया के परिणाम स्वरूप सृजित होता है कर्म । कर्ता पुरुष होता है । परंतु प्रकृति अपने विज्ञान के द्वारा निहित गुणों की सहायता से पुरुष को बाध्य करती है कर्म के लिये ।
परम् ब्रम्ह ने प्रकृति के रूप में अपने को प्रगट किया है । जो भी सुंदरता, शौर्य, शक्ति, उर्जा, प्रकृति के विभिन्न घटको में विस्तरित है वह ब्रम्ह की ब्यापकता की द्योतक है । सूर्य, तारे, जहाँ असीम उर्जा के पुँज है वहीं नियंत्रित क्रिया सम्पादन का जो स्वरूप प्रस्तुत करते है वह ब्रम्ह का व्यापक विज्ञान है प्रकृति के रूप में । विडम्बना यह कि प्रकृति पूर्णरूप से आश्रित है ब्रम्ह पर जबकि ब्रम्ह प्रकृति पर आश्रित नहीं है ।
मनुष्य शरीर में निहित ब्रम्ह के अंश आत्मा की प्रतिक्रिया ब्रम्ह के विज्ञान प्रकृति के साथ जननी है कर्म की । कर्म शाश्वत होना विकास और कर्म दूशित होना पतन अवनती है । प्रकृति के रूप में विस्तरित ब्रम्ह का विज्ञान अति रहस्यमय व गूढ है जिसके कारण आत्मा कर्ता को अति नियंत्रित, अनुशासित कार्य संचालन प्रेरित करने की वाँक्षना होती है ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण 

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
यह सृष्टि कर्म प्रधान है । मनुष्य का जन्म कर्म करने के लिये ही है । कर्म का सृजन प्रकृति और पुरुष के परस्पर क्रिया से होता है । प्रकृति ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । पुरुष ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति गुणों से युक्त है । प्रकृति के गुणों का भोक्ता पुरुष होता है । प्रकृति ब्रम्ह पर आश्रित होती है परंतु ब्रम्ह प्रकृति पर आश्रित नहीं होता है । इस प्रकार सब मिल कर एक ब्यूह का स्वरूप बन जाता है । इसी ब्यूह के अंतर्गत मनुष्य को अपना कर्म दायित्व पूरा करना होता है ।
प्रकृति के गुणों का भोक्ता होने के कारण पुरुष प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित कर लेता है । प्रकृतीय रचनाओं के प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है जिसके वशीभूत उनके स्वामित्व की कामना जन्म ले लेती है पुरुष में । प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया में पुरुष का स्वरूप कर्ता के रूप में होने के कारण उसमें अहंकार का सृजन हो जाता है । यह तीनो ही सृजन उसके ब्रम्ह स्वरूप के बिपरीत होते हैं । यही मूल होता है दोषपूर्ण क्रियाँओं के उद्भव का ।
यद्यपि कि दोषों को बताया गया परंतु इनके निवारण इतने सरल नहीं होते । अत्यंत निष्ठापूर्ण प्रयत्नों की आवश्यकता होती है । फिर प्रकृति की कार्य शैली इतनी विलक्षण होती है कि उपरोक्त दोष पुरुष कब ग्रहण कर लेता है यह उसे पता भी नहीं चल पाता है ।
कर्म सम्पादन अर्थात जीवन यापन के लिये मनुष्य शरीर की रचना, शरीर निर्माण में प्रयुक्त घटकों का सन्क्षिप्त परिचय के उपरांत अब जानना होगा वह सविंधान जिसके अधीन क्रिया सम्पादन अपेक्षित होता है । जानना होगा उन उपायों को जिनसे वह ज्ञात कर सकेगा कि उसमें कौन से दुर्गुण किस स्तर तक विद्यमान हैं । फिर जानना होगा कि उपस्थित दुर्गुणों का निवारण का उपाय । साथ ही जानना होगा कि उपस्थित दुर्गुणों के निवारण करते हुये नये दुर्गुणों का सृजन ना सम्भव होवें।
पुन: यह स्मरण कराना प्रसंग के अनुकूल होगा कि ज्ञान यात्रा मात्र सिद्धांतिक ज्ञान की नहीं अपितु कर्म सम्पादन में अभ्यास से सम्भव होगी । अत: परम् ब्रम्ह की अस्तुति भजन का अभ्यास सतत् करते आगे बढें । 

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण