संसार ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है
जबकि ब्रम्ह संसार का कारण है । अभिव्यक्ति सदैव कारण की अपेक्षा आंशिक सत्य होता
है । इस कारण संसार ब्रम्ह की अपेक्षा आंशिक सत्य है । इस तर्क का प्रमाण संसार के
अनुभव में व्याप्त विरोधाभास के अनुभवों से मिलता है । संसार विरोधाभास के अनुभवों
से ओतप्रोत है । कहा जाय कि संसार विरोधाभास के अनुभवों का भोग है जबकि ब्रम्ह
विरोधाभास से परे है ।
रविवार, 31 अगस्त 2014
शनिवार, 30 अगस्त 2014
माया का रूप 6
माया के रूप 5 में अंकित अविद्या माया मात्र हम मनुष्यों के लिये सीमित
है जो कि मनुष्य को ब्रम्ह के ज्ञान से ओझिल किये रहती है । ब्रम्ह जोकि माया का जनक
एवँ नियंत्रक है उसके लिये यह विद्यामाया है । ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रम्ह माया
के मोटे कवच को ओढे रहता है ।
शुक्रवार, 29 अगस्त 2014
माया का रूप 5
ब्रम्ह की माया से निर्मित संसार
अपने जीवों से ब्रम्ह को ओझल करता है । इस रूप में इसे मोंह का निमित्त कहा जाना
उचित है । यदि संसार को मात्र प्रकृतीय रचना माना जाय जिसका ब्रम्ह से कोई सम्बंध
नहीं है तो ऐसी दशा में ब्रम्ह को जानने का कोई पथ नहीं मिलेगा । ऐसी दशा में
संसार मोंह का निमित्त है । इस परिस्थिति में ब्रम्ह की माया अविद्या माया कही
जावेगी ।
गुरुवार, 28 अगस्त 2014
माया का रूप 4
उत्तरोत्तर विचारों में निम्न
प्रकृति को ही माया कहा जाता है क्योंकि पुरुष के विषय में बताया जाता है कि इस
संसार की रचना को सम्भव बनाने के उद्देष्य से ब्रम्ह पुरुष को प्रकृति के गर्भ में
स्थापित करते हैं । समस्त प्रगट रूप प्रकृति निर्मित ही होते हैं ।
बुधवार, 27 अगस्त 2014
माया का रूप 3
ब्रम्ह ने संसार की रचना दो घटको प्रकृति
और पुरुष के सन्योग से सम्भव की है । इसलिये इन दोनो ही घटको को ब्रम्ह की माया
कहा जाता है । पुरुष को उच्चतर माया कहा जाता है और प्रकृति को निम्न माया कहा
जाता है ।
मंगलवार, 26 अगस्त 2014
माया का रूप 2
वैयक्तिक ईश्वर ( प्रकृति ) सत् और
असत् दोनो का धारक है । अपरिवर्तनीय ब्रम्ह का रूप सत् तथा संसार के रूपों के सृजन
की क्षमता द्वारा सृजित रूप असत् । माया ही वह शक्ति है जो ब्रम्ह को रूप सृजित
करने में समर्थ बनाती है । माया ईश्वर की रूप प्रगट करने की शक्ति है । माया और
ईश्वर इस रूप में एक दूसरे के आश्रित हैं और अनादि काल से विद्यमान हैं ।
सोमवार, 25 अगस्त 2014
माया का रूप 1
परम् सत्य ब्रम्ह यदि संसार में
घटित होने वाली घटनाओं से नहीं प्रभावित होता है तो इन घटनाओं के सृजित होने की
व्याख्या नहीं की जा सकती है । अनादिकाल से अस्तित्व में विद्यमान परंतु फिरभी
सत्य नहीं और अविद्या का श्रोत यह संसार माया का पहला रूप है ।
रविवार, 24 अगस्त 2014
माया अशांति का मूल
विस्तृत माया के प्रति मोंह । इस
माया को पाने की इच्छा । यही हमें दूर करता है ब्रम्ह से । ब्रम्ह से दूर होना ही
अशांति है । यह संसार दु:खों से भरा हुआ है । यह कहा जाता है कि इस माया से पार
पाना अति दुष्कर है । इस कथन का भाव यह होता है कि इस संसार और इसमें चल रही
गतिविधियों को वेधना अति कठिन होता है । असम्भव नहीं है । परंतु बिना विचारे सब
कुछ करते रहने से नहीं सम्भव हो सकता । सचेत दृढ प्रयत्न से माया की ओट में छिपे
ब्रम्ह के दर्शन मिलते हैं ।
शनिवार, 23 अगस्त 2014
तिरोधन
ब्रम्ह ने अपने को अपनी माया की आड
में छिपा लिया । तिरोधन । मनुष्य मोंहित है माया में । इतना कि उसे ब्रम्ह की कोई
कामना ही नहीं । ब्रम्ह छलिया है । उसने माया का विस्तार किया । हमारे अंदर वासनाओ
को वहिर्मुखी बनाया । हम इतनी तल्लीनता से उन वासनाओं का पीछा करने लगे कि कंचिद
हमें अपने अस्तित्व की वास्तविकता को जानने की आवश्यकता ही नहीं रह गई । तिरोधन ।
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
माया मोंह का निमित्त
यह संसार ब्रम्ह का ही प्रगट रूप
है । यह ब्रम्ह की माया है । परंतु जब मनुष्य इसी प्रगट रूप में उलक्ष कर रह जाता
है । ब्रम्ह को भूल ही जाता है । तो यह स्थिति कही जावेगी कि ब्रम्ह की माया ने
ब्रम्ह को ही छिपा दिया । यह संसार भ्रम नहीं है । भ्रम का निमित्त अवश्य है । इस
प्रकृति के गुणों में मोंह । यही बिलगाव का पहला स्थल है । फिर तो उलक्षते ही चले
जावेंगे । यही ब्रम्ह की माया है । इस माया का विस्तार अति व्यापक है । कोई बच
नहीं पाता । परंतु जो योगी इसे पहचानेगा । इससे बचने का पथ अपनायेगा । वही जानेगा
आनंद ।
गुरुवार, 21 अगस्त 2014
योगमाया
रूप सृजित करने की क्षमता परम्
सत्य ब्रम्ह में निहित है । ‘ माँ ‘ शब्द का अर्थ बताया जाता है – सृजित करना, बनाना । अनादि काल से इस शब्द का प्रयोग रूप सृजित
करने की क्षमता को व्यक्त करने के लिये किया जाता रहा है । हम प्रत्येक का
अस्तित्व कहाँ से मिला – माँ से । ब्रम्ह जिस निर्माण शक्ति से इस समूचे
ब्रम्हाण्ड को रूप प्रदान करता है उसे योगमाया कहा जाता है । ब्रम्ह की रूप सृजित
करने की क्षमता को मायिन कहा जाता है । यह संसार का स्वरूप जो सम्मुख है – सब ब्रम्ह की माया है ।
बुधवार, 20 अगस्त 2014
अविद्या
विचारको का वह वर्ग जो कि परम्
सत्य ब्रम्ह को सम्बन्धविहीन और वैयक्तिक बंधन से च्युत मानता है और समस्त रूप
सृजन को प्रकृति का कृत मानता है वह अविद्या के प्रभाव से ग्रसित कहा जावेगा ।
प्रकृतीय रूप सृजन मात्र काल की सीमा से बँधा हुआ होने के कारण क्षणभँगुर है और उस
परम् सत्य के सापेक्ष असत्य होता है इसलिये इस रूप को मान्यता देना अविद्या है ।
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
ब्रम्हाण्ड
मैं और मैं-नहीं की प्रतिक्रिया
में सबसे पहले सृजित हुआ ब्रम्हाण्ड । यह समस्त रूप स्वरूपों को धारण किये होता है
। इसमें अनेको संसार, सौर मण्डल समाहित पाये जाते हैं । इसमें भूत, वर्तमान और भविष्य एक सर्वोच्च वर्तमान में समाया होता है । इसके उत्पत्ति के
वाद पैदा हुई रचनाये इसके अंदर सूक्ष्म अंग के रूप में समाहित रहती हैं ।
सोमवार, 18 अगस्त 2014
ब्रम्ह और प्रगट रूप
ब्रम्ह संसार के पीछे भी है, संसार की सीमा समाप्त होने के बाद भी है, संसार में भी है । प्रकृति के रूप
में उसने अपने को प्रगट किया है । ब्रम्ह ही हमारे ज्ञान की ऊपरी सीमा है । ज्ञात
निम्नतम सीमा तक प्रकृति है । इस न्यूनतम सीमा से भी नीचे विशुद्ध मैं-नहीं है ।
इससे भी नीचे यदि हम जाँय तो शून्य स्थित है । यह निरापद बिना अस्तित्व की स्थिति है
। इस रूप के संसार में सभी कुछ मात्र मैं और मैं-नही के मध्य परस्पर क्रिया है ।
रविवार, 17 अगस्त 2014
संसार का रूप
यह संसार मैं और मैं-नहीं के मध्य
परस्पर क्रिया का प्रगट रूप होता है । मैं-नहीं क्यों है ? संसार में पतन की प्रक्रिया क्यों
है ? हम परम् सत्य से क्यों बिछुड कर इस
जन्म मरण के चक्र में हैं ? इस सृष्टि में मैं और मैं-नहीं के मध्य क्यों सतत्
स्पर्धा चल रही है ? यह सभी प्रश्न यह पूछने के समान है कि यह संसार
क्यों है ? इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि परम् ब्रम्ह ने अपने को इसी रूप में
प्रगट किया है । हम मात्र इस संसार में घटित होने वाली घटनाओं के अध्ययन से
निष्कर्श निकाल सकते हैं । इसकी उत्पत्ति के निमित्त को नहीं जान सकते हैं ।
शनिवार, 16 अगस्त 2014
सृष्टि
समय और परिवर्तन का चक्र समस्त
सृष्टि को ब्रम्ह की अनुभूति और तद्नुसार जीवन को प्रशस्त करती है । इस प्रक्रिया
में बाधक होती है प्रकृति जो कि अपने गुणों के मोंह में बाँध सभी को मुक्ति से दूर
करती है । इसके बावज़ूद भी प्रकृति ब्रम्ह के लिये अपरिहार्य अवयव है क्योंकि
ब्रम्ह अपने को इसी प्रकृति के रूप में ही प्रगट करता है ।
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
अद्वैत
मैं-नही अर्थात् प्रकृति मैं
ब्रम्ह के अधीन होती है । इसलिये विचारक विद्वानों का एक वर्ग इसे अलग नहीं मानता
अपितु मैं और मैं-नहीं को एक ही मानता है । अद्वैत । प्रकृति को ब्रम्ह ने रचा
अपने को प्रगट करने के लिये । यही प्रकृति ब्रम्ह को प्रगट भी करती है और प्रकृति
ही ब्रम्ह का दर्शन बाधित भी करती है । फिरभी प्रकृति ब्रम्ह के लिये अनिवार्य
अवयव है । समय और परिवर्तन का स्वाभाविक चक्र संसार के प्रत्येक अवयव को मुक्ति
प्रशस्थ करती है । बंधन प्रकृति ही सृजित करती है । मैं और मैं-नहीं दोनो ही एक ही
सत्य के दो ध्रुव हैं ।
गुरुवार, 14 अगस्त 2014
सृष्टि का संचालन
संसार की रचना मैं ( ब्रम्ह ) और
मैं-नहीं ( प्रकृति ) के सन्योग से सम्भव हुई है । संसार की समस्त प्रक्रिया इन्ही
दोनों की परस्पर प्रतिक्रिया द्वारा संचालित हो रही है । मैं-नहीं पूर्णरूप से मैं
द्वारा वेध्य एवँ नियंत्रित होती है । परंतु मैं-नहीं में प्रतिरोध की क्षमता
अत्यधिक प्रबल पायी जाती है । प्रतिरोध वेध्यता से और प्रतिरोध नियंत्रण से । इस
क्षमता के कारण ही मैं-नहीं अर्थात प्रकृति बुरी होती है ।
बुधवार, 13 अगस्त 2014
साक्षात् ब्रम्ह
संसार ब्रम्ह का साक्षात् रूप
प्रदर्षित करता है । मानो ब्रम्ह जल की सतह पर प्रगट हुये और जल में उनका
प्रतिबिम्ब संसार के स्वरूप में विदित हुआ है । इस संसार की रचना में दो भाग हैं ।
प्रथम ब्रम्ह और द्वितीय ब्रम्ह-नहीं ( प्रकृति )
। जब ब्रम्ह-नहीं की कल्पना सम्मुख हुई तो समस्त स्वरूपों में ब्रम्ह ही
विस्तरित हो गया । ब्रम्ह-नहीं ( प्रकृति ) ब्रम्ह की ही प्रतिबिम्ब है इसलिये
ब्रम्ह के अधीन है । ब्रम्ह ने अपने एकल स्वरूप को समस्त संसार में विस्तरित कर
दिया
मंगलवार, 12 अगस्त 2014
ब्रम्ह और ईश्वर
द्वैत से मुक्त आत्मा को यदि संसार
की ओर से देखा जाय तो वह ब्रम्ह में लीन प्रगट होगी । इसी प्रकार यदि ब्रम्ह की ओर
से संसार को देखा जाय तो इसमें अव्यक्त शक्ति ईश्वर के रूप में प्रगट होगी ।
ब्रम्ह और संसार दोनो एक ही सत्य के दो ध्रुव हैं । इन्हें अलग नहीं किया जा सकता
है ।
सोमवार, 11 अगस्त 2014
तर्क
विगत तीन अंको में वर्णित परिवर्तन
की तीनों विधायें ब्रम्ह पर प्रभावी नहीं बतायी गयी हैं । इसलिये सामान्य भावार्थ
यही बनता है कि अपरिवर्तनीय ब्रम्ह और परिवर्तनीय संसार में कोई सम्बंध नहीं है ।
परंतु यथार्त स्थिति यह है कि ब्रम्ह संसार के कण कण में विद्यमान है । तो क्या
समस्त परिवर्तन मात्र दिखावा हैं । यदि ब्रम्ह किसी परिवर्तन में नहीं सम्मलित है
तो संसार में होने वाले परिवर्तन मात्र भ्रम हैं । इससे तर्क उत्पन्न होता है कि
या तो ब्रम्ह ने ही अपने को संसार के रूप में प्रगट किया है अथवा ब्रम्ह स्वयं ही
संसार में होने वाले समस्त परिवर्तनो का संचालक है । कंचिद उपरोक्त दोनो ही तर्क
सत्य है । समय गति और रूपग्राह्यता यह ब्रम्ह के tools यंत्र है जिनके माध्यम से वह संसार का संचालन करता है
।
रविवार, 10 अगस्त 2014
रूपग्राह्यता
एक रूप से दूसरे रूप में अंतरित
होना । यथा बर्फ से पानी पुन: पानी से वाष्प में रूप परिवर्तन । पदार्थ एक ही है ।
रूप बदलते जाते है । पुन: परिवर्तन की यह तीसरी विधा भी मात्र संसार के लिये
प्रभावी होती है । ब्रम्ह पर यह भी प्रभावी नही होती है ।
शनिवार, 9 अगस्त 2014
गति
एक सीमित परिवेष में यह भी
परिवर्तन ही व्यक्त करती है । पुन: गति भी संसार के घटको के लिये ही प्रभावी होती
है । ब्रम्ह में किसी गति की कल्पना सम्भव नहीं है । इस प्रकार परिवर्तन के द्योतक
दूसरी विधा गति भी ब्रम्ह पर प्रभावी नहीं होती है । ब्रम्ह अपरिवर्तनीय अस्तित्व
है ।
शुक्रवार, 8 अगस्त 2014
समय
समय का उद्भव परिवर्तन से बताया
जाता है । जो कुछ भी स्थिति किसी समय विषेस पर है वह दूसरे समय स्थल पर ना रह जाय
तो परिवर्तन प्रगट हुआ । संसार की प्रत्येक रचना समय के प्रभाव से आच्छादित होती
है । परंतु ब्रम्ह समय के प्रभाव से ग्रसित नहीं होता । ब्रम्ह सदैव अपरिवर्तित
रहता है ।
गुरुवार, 7 अगस्त 2014
व्याख्या
माया कंचिद संसार को भ्रम नहीं
बताती । परम् सत्य ब्रम्ह का ज्ञान होने पर विनाशशील संसार भ्रम समान प्रतीत होने
लगता है । ब्रम्ह की उपस्थिति होने पर ही संसार का स्वरूप सम्भव होता है । यह
समस्त अनुभूतियाँ ब्रम्ह की महिमा का प्रमाण है । ब्रम्ह की अनूठी महिमा जिसको कि
इस संसार को उपलब्ध ज्ञान द्वारा जाना नहीं जा सकता है उसे माया शब्द द्वारा
व्यक्त किया जाता है । ब्रम्ह ने इस संसार को बना कर अपने इसके कण कण में उपस्थित
होते हुये भी अपने को इस संसार की दृष्टि से छिपा लिया है । यह माया के प्रभाव से
सम्भव हुआ है ।
बुधवार, 6 अगस्त 2014
माया
संसार ब्रम्ह पर आश्रित है जबकि
ब्रम्ह संसार पर आश्रित नहीं है । ब्रम्ह निराकार होने के नाते सांसारिक मानको से
इसे जाना नहीं जा सकता है । संसार प्रगट स्वरूप में होते हुये भी चिर सत्य के
सापेक्ष इसे भ्रम माना जाता है । इन तीनों स्थितियों (1) एक पक्षीय आश्रितता (2)
ब्रम्ह की अज्ञेयता (3) संसार का प्रगट स्वरूप होते हुये भी भ्रम माना जाना को एक
एकल शब्द माया द्वारा व्यक्त किया जाता है ।
मंगलवार, 5 अगस्त 2014
संसार
संसार का प्रगट स्वरूप है । इसलिये
इसे तर्को के आधार पर निराकार ब्रम्ह के साथ सम्बद्ध नहीं किया जा सकता है । संसार
की प्रत्येक रचना काल की सीमा से बँधी हुई है । इसलिये इसे चिर ब्रम्ह के सापेक्ष
सत्य नहीं कहा जा सकता है । परंतु अपने अस्तित्व के कारण इसे असत्य भी नहीं कहा जा
सकता है । आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर इसे भ्रम कहा जा सकता है ।
सोमवार, 4 अगस्त 2014
ब्रम्ह
ब्रम्ह को निर्गुण, निराकार, चिर, दिव्य, शांत और आनंद
बताया जाता है । ब्रम्ह स्वत: अस्तित्व है । ब्रम्ह के अतिरिक्त जो कुछ भी है वह
ब्रम्ह पर आश्रित है जबकि ब्रम्ह किसी अन्य पर आश्रित नहीं है ।
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