माया
रविवार, 10 अगस्त 2014
रूपग्राह्यता
एक रूप से दूसरे रूप में अंतरित होना । यथा बर्फ से पानी पुन: पानी से वाष्प में रूप परिवर्तन । पदार्थ एक ही है । रूप बदलते जाते है । पुन: परिवर्तन की यह तीसरी विधा भी मात्र संसार के लिये प्रभावी होती है । ब्रम्ह पर यह भी प्रभावी नही होती है ।
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