ब्रम्ह संसार के पीछे भी है, संसार की सीमा समाप्त होने के बाद भी है, संसार में भी है । प्रकृति के रूप
में उसने अपने को प्रगट किया है । ब्रम्ह ही हमारे ज्ञान की ऊपरी सीमा है । ज्ञात
निम्नतम सीमा तक प्रकृति है । इस न्यूनतम सीमा से भी नीचे विशुद्ध मैं-नहीं है ।
इससे भी नीचे यदि हम जाँय तो शून्य स्थित है । यह निरापद बिना अस्तित्व की स्थिति है
। इस रूप के संसार में सभी कुछ मात्र मैं और मैं-नही के मध्य परस्पर क्रिया है ।
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