संसार ब्रम्ह पर आश्रित है जबकि
ब्रम्ह संसार पर आश्रित नहीं है । ब्रम्ह निराकार होने के नाते सांसारिक मानको से
इसे जाना नहीं जा सकता है । संसार प्रगट स्वरूप में होते हुये भी चिर सत्य के
सापेक्ष इसे भ्रम माना जाता है । इन तीनों स्थितियों (1) एक पक्षीय आश्रितता (2)
ब्रम्ह की अज्ञेयता (3) संसार का प्रगट स्वरूप होते हुये भी भ्रम माना जाना को एक
एकल शब्द माया द्वारा व्यक्त किया जाता है ।
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