संसार की रचना मैं ( ब्रम्ह ) और
मैं-नहीं ( प्रकृति ) के सन्योग से सम्भव हुई है । संसार की समस्त प्रक्रिया इन्ही
दोनों की परस्पर प्रतिक्रिया द्वारा संचालित हो रही है । मैं-नहीं पूर्णरूप से मैं
द्वारा वेध्य एवँ नियंत्रित होती है । परंतु मैं-नहीं में प्रतिरोध की क्षमता
अत्यधिक प्रबल पायी जाती है । प्रतिरोध वेध्यता से और प्रतिरोध नियंत्रण से । इस
क्षमता के कारण ही मैं-नहीं अर्थात प्रकृति बुरी होती है ।
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