ब्रम्ह ने अपने को अपनी माया की आड
में छिपा लिया । तिरोधन । मनुष्य मोंहित है माया में । इतना कि उसे ब्रम्ह की कोई
कामना ही नहीं । ब्रम्ह छलिया है । उसने माया का विस्तार किया । हमारे अंदर वासनाओ
को वहिर्मुखी बनाया । हम इतनी तल्लीनता से उन वासनाओं का पीछा करने लगे कि कंचिद
हमें अपने अस्तित्व की वास्तविकता को जानने की आवश्यकता ही नहीं रह गई । तिरोधन ।
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