यह संसार ब्रम्ह का ही प्रगट रूप
है । यह ब्रम्ह की माया है । परंतु जब मनुष्य इसी प्रगट रूप में उलक्ष कर रह जाता
है । ब्रम्ह को भूल ही जाता है । तो यह स्थिति कही जावेगी कि ब्रम्ह की माया ने
ब्रम्ह को ही छिपा दिया । यह संसार भ्रम नहीं है । भ्रम का निमित्त अवश्य है । इस
प्रकृति के गुणों में मोंह । यही बिलगाव का पहला स्थल है । फिर तो उलक्षते ही चले
जावेंगे । यही ब्रम्ह की माया है । इस माया का विस्तार अति व्यापक है । कोई बच
नहीं पाता । परंतु जो योगी इसे पहचानेगा । इससे बचने का पथ अपनायेगा । वही जानेगा
आनंद ।
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