विस्तृत माया के प्रति मोंह । इस
माया को पाने की इच्छा । यही हमें दूर करता है ब्रम्ह से । ब्रम्ह से दूर होना ही
अशांति है । यह संसार दु:खों से भरा हुआ है । यह कहा जाता है कि इस माया से पार
पाना अति दुष्कर है । इस कथन का भाव यह होता है कि इस संसार और इसमें चल रही
गतिविधियों को वेधना अति कठिन होता है । असम्भव नहीं है । परंतु बिना विचारे सब
कुछ करते रहने से नहीं सम्भव हो सकता । सचेत दृढ प्रयत्न से माया की ओट में छिपे
ब्रम्ह के दर्शन मिलते हैं ।
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