रविवार, 24 अगस्त 2014

माया अशांति का मूल

विस्तृत माया के प्रति मोंह । इस माया को पाने की इच्छा । यही हमें दूर करता है ब्रम्ह से । ब्रम्ह से दूर होना ही अशांति है । यह संसार दु:खों से भरा हुआ है । यह कहा जाता है कि इस माया से पार पाना अति दुष्कर है । इस कथन का भाव यह होता है कि इस संसार और इसमें चल रही गतिविधियों को वेधना अति कठिन होता है । असम्भव नहीं है । परंतु बिना विचारे सब कुछ करते रहने से नहीं सम्भव हो सकता । सचेत दृढ प्रयत्न से माया की ओट में छिपे ब्रम्ह के दर्शन मिलते हैं ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें