विगत तीन अंको में वर्णित परिवर्तन
की तीनों विधायें ब्रम्ह पर प्रभावी नहीं बतायी गयी हैं । इसलिये सामान्य भावार्थ
यही बनता है कि अपरिवर्तनीय ब्रम्ह और परिवर्तनीय संसार में कोई सम्बंध नहीं है ।
परंतु यथार्त स्थिति यह है कि ब्रम्ह संसार के कण कण में विद्यमान है । तो क्या
समस्त परिवर्तन मात्र दिखावा हैं । यदि ब्रम्ह किसी परिवर्तन में नहीं सम्मलित है
तो संसार में होने वाले परिवर्तन मात्र भ्रम हैं । इससे तर्क उत्पन्न होता है कि
या तो ब्रम्ह ने ही अपने को संसार के रूप में प्रगट किया है अथवा ब्रम्ह स्वयं ही
संसार में होने वाले समस्त परिवर्तनो का संचालक है । कंचिद उपरोक्त दोनो ही तर्क
सत्य है । समय गति और रूपग्राह्यता यह ब्रम्ह के tools यंत्र है जिनके माध्यम से वह संसार का संचालन करता है
।
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