संसार ब्रम्ह का साक्षात् रूप
प्रदर्षित करता है । मानो ब्रम्ह जल की सतह पर प्रगट हुये और जल में उनका
प्रतिबिम्ब संसार के स्वरूप में विदित हुआ है । इस संसार की रचना में दो भाग हैं ।
प्रथम ब्रम्ह और द्वितीय ब्रम्ह-नहीं ( प्रकृति )
। जब ब्रम्ह-नहीं की कल्पना सम्मुख हुई तो समस्त स्वरूपों में ब्रम्ह ही
विस्तरित हो गया । ब्रम्ह-नहीं ( प्रकृति ) ब्रम्ह की ही प्रतिबिम्ब है इसलिये
ब्रम्ह के अधीन है । ब्रम्ह ने अपने एकल स्वरूप को समस्त संसार में विस्तरित कर
दिया
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