मैं-नही अर्थात् प्रकृति मैं
ब्रम्ह के अधीन होती है । इसलिये विचारक विद्वानों का एक वर्ग इसे अलग नहीं मानता
अपितु मैं और मैं-नहीं को एक ही मानता है । अद्वैत । प्रकृति को ब्रम्ह ने रचा
अपने को प्रगट करने के लिये । यही प्रकृति ब्रम्ह को प्रगट भी करती है और प्रकृति
ही ब्रम्ह का दर्शन बाधित भी करती है । फिरभी प्रकृति ब्रम्ह के लिये अनिवार्य
अवयव है । समय और परिवर्तन का स्वाभाविक चक्र संसार के प्रत्येक अवयव को मुक्ति
प्रशस्थ करती है । बंधन प्रकृति ही सृजित करती है । मैं और मैं-नहीं दोनो ही एक ही
सत्य के दो ध्रुव हैं ।
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