समय और परिवर्तन का चक्र समस्त
सृष्टि को ब्रम्ह की अनुभूति और तद्नुसार जीवन को प्रशस्त करती है । इस प्रक्रिया
में बाधक होती है प्रकृति जो कि अपने गुणों के मोंह में बाँध सभी को मुक्ति से दूर
करती है । इसके बावज़ूद भी प्रकृति ब्रम्ह के लिये अपरिहार्य अवयव है क्योंकि
ब्रम्ह अपने को इसी प्रकृति के रूप में ही प्रगट करता है ।
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