विचारको का वह वर्ग जो कि परम्
सत्य ब्रम्ह को सम्बन्धविहीन और वैयक्तिक बंधन से च्युत मानता है और समस्त रूप
सृजन को प्रकृति का कृत मानता है वह अविद्या के प्रभाव से ग्रसित कहा जावेगा ।
प्रकृतीय रूप सृजन मात्र काल की सीमा से बँधा हुआ होने के कारण क्षणभँगुर है और उस
परम् सत्य के सापेक्ष असत्य होता है इसलिये इस रूप को मान्यता देना अविद्या है ।
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