रविवार, 17 अगस्त 2014

संसार का रूप

यह संसार मैं और मैं-नहीं के मध्य परस्पर क्रिया का प्रगट रूप होता है । मैं-नहीं क्यों है ? संसार में पतन की प्रक्रिया क्यों है ? हम परम् सत्य से क्यों बिछुड कर इस जन्म मरण के चक्र में हैं ? इस सृष्टि में मैं और मैं-नहीं के मध्य क्यों सतत् स्पर्धा चल रही है ? यह सभी प्रश्न यह पूछने के समान है कि यह संसार क्यों है ? इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि परम् ब्रम्ह ने अपने को इसी रूप में प्रगट किया है । हम मात्र इस संसार में घटित होने वाली घटनाओं के अध्ययन से निष्कर्श निकाल सकते हैं । इसकी उत्पत्ति के निमित्त को नहीं जान सकते हैं । 

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