यह संसार मैं और मैं-नहीं के मध्य
परस्पर क्रिया का प्रगट रूप होता है । मैं-नहीं क्यों है ? संसार में पतन की प्रक्रिया क्यों
है ? हम परम् सत्य से क्यों बिछुड कर इस
जन्म मरण के चक्र में हैं ? इस सृष्टि में मैं और मैं-नहीं के मध्य क्यों सतत्
स्पर्धा चल रही है ? यह सभी प्रश्न यह पूछने के समान है कि यह संसार
क्यों है ? इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि परम् ब्रम्ह ने अपने को इसी रूप में
प्रगट किया है । हम मात्र इस संसार में घटित होने वाली घटनाओं के अध्ययन से
निष्कर्श निकाल सकते हैं । इसकी उत्पत्ति के निमित्त को नहीं जान सकते हैं ।
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